हायनान्त-युवादिभ्यो ऽण्

Adhyāya 5 · Pāda 1 · Rule 130

The affix aṇ comes in the sense of 'nature or action thereof' after compounds ending in hāyana and after yuvana etc.,

Thus द्विहायनस्य भावः कर्म वा = द्वैहायनम्, त्रैहायनम्; यौवनम्, स्थाविरम् ॥

Vart:- The य of श्रोत्रिय is elided, as श्रोत्रियस्य भावः कर्म वा = श्रौत्रम् ॥

1 युवन्, 2 स्थविर, 3 होतृ, 4 यजमान, 5 पुरुषासे (पुरुष असमासे), 6 भ्रातृ (भानृ), 7 कुतुक (कतक), 8 श्रमण (श्रणम), 9 कटुक, 10 कमण्डलु, 11 कुस्त्री, 12 सुस्त्री, 13 दुःस्त्री, 14 सुहृदय 15 दुर्हृदय, 16 सुहृद्, 17 दुर्हृद्, 18 सुभ्रातृ, 19 दुर्भ्रातृ, 20 वृषल, 21 परिव्राजक, 22 सब्रह्मचारिन्, 23 अनृशंस, 24 हृदयासे (हृदय असमासे), 25 कुशल, 26 चपल, 27 निपुण, 28 पिशुन, 29 कुतूहल, 30 क्षेत्रज्ञ, 31 श्रोत्रियस्य यलोपश्च, 32 यातृ, 33 कृतक, 34 कुचुक, 35 कन्दुक, 36 मिथुन, 37 कुलली, 38 मण्डण, 39 कितव, 40 पोत. ॥,

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