गुणवचन-ब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च

Adhyāya 5 · Pāda 1 · Rule 124

The affix ṣyañ has after a word expressive of quality and after brāhmaṇa etc., the sense of the activity or occupation or something or someone.,

The च in the aphorism is employed with the intention of including भाव or
ature\. The word कर्म denotes activity. जडस्य भावः कर्म वा = जाड्यम् so also ब्राह्मण्यम्, माणव्यम् ॥

The words भाव and कर्म bear rule upto the end of the chapter. This class of ब्राह्मण &c, is akritigana i. e. the fact of a word belonging to which is known only from the forms met with in writers of authority.

Vart:- The affix does not change the sense in चातुर्वर्ण्य &c, as चत्वार एव वर्णाः = चातुर्वर्ण्यम् ॥ चातुराश्रम्यम्, त्रैलोक्यम्, त्रैस्वर्ग्यम्, षाड्गुण्यम्, सैन्यम्, सान्निध्यम्, सामीप्यम्, औपम्यम्, सौख्यम् ॥

1 ब्राह्मण, 2 वाडव, 3 माणव, 4 अर्हतो नुम् च, as आर्हन्त्यम् 5 चोर, 6 धूर्त 7 आराधय, 8 विराधय, 9 अपराधय, 10 उपराधय, 11 एकभाव, 12 द्विभाव, 13 त्रिभाव, 14 अन्यभाव, 15 अक्षेत्रज्ञ, 16 संवादिन्, 17 संवेशिन्, 18 संभाषिन्, 19 बहुभाषिन्, 20 शीर्षघातिन् (शीर्षपातिन्), 21 विघातिन्, 22 समस्थ, 23 विषमस्थ, 24 परमस्थ, 25 मध्यमस्थ, 26 अनीश्वर, 27 कुशल, 28 चपल, 29 निपुण, 30 पिशुन, 31 कुतूहल, 32 क्षेषज्ञ, 33 निश्न, 34 बालिश, 35 अलस, 36 दुष्पुरुष, 37 कापुरुष, 38 राजन्, 39 गणपति, 40 अधिपति, 41 गडुल, 42 दायाद, 43 विशस्ति, 44 विषम, 45 विपात, 46 निपात, 47 सर्ववेदादिभ्यः स्वार्थे, सार्ववेद्यः = सर्ववेदः ॥ 48 चतुर्वेदस्योभयपदवृद्धिश्च, as चातुर्वैद्यम् 49 शौठीर 50 मूक, 51 कपि, 52 विशसि, 53 पिशाच, 54 विशाल, 55 धनपति, 56 नरपति, 57 निव 58 निधान 59 विष, 60 स्वभाव, 61 निघातिन्, 62 राजपुरुष, 63 विशाय 64 विशात, 65 विजात, 66 नयात, 67 सुहित, 68 दीन, 69 विदग्ध, 70 उचित, 71 समग्र, 72 शील, 73 तत्पर, 74 इदंपर 75 यथा तथा, 76 पुरस्, 77 पुनः पुनः, 78 अभाक्ष्ण, 79 तरतम, 80 प्रकाम, 81 यथाकाम, 82 निष्कुल, 83 स्वराज, 84 महाराज, 85 युवराज, 86 सम्राज्, 87 अविदूर, 88 अपिशुन, 89 अनुशंस, 90 अयथातथ 91 अयथापुर, 92 स्वधर्म, 93 अनुकुल, 94 परिमण्डल, 95 विश्वरूप, 96 ऋत्विज्, 97 उदासीन, 98 ईश्वर, 99 प्रतिभू, 100 साक्षि(न्), 101 मानुष, 102 आस्तिक, 103 नास्तिक, 104 युगपद्, 105 पूर्वाधर, 106 उत्तराधर ॥ आकृतिगण ॥,

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